निर्भया

सुबह निकली घर से,
बहुत खुश थी मैं ,
कहाँ खबर थी मुझे,
जमी थी किसी की गिद्ध दृष्टि,
भेद रही थी निगाहें शरीर,
मन में वासना लिए,
लपलपा रहा था जिह्वा कोई,
अनजान नहीं था वो,
रोज मिलते थे वो ‘अंकल’,
बेटी उनकी मेरी सहेली थे,
बल्कि मैं ही अनजान थी,
इरादों से उनके,
उस रोज स्कूल आये वो,
मुझे घर ले जाने को,
बताया कुछ हुआ था घर पर,
मैं भी चल दी साथ में,
बिना कुछ सोचे समझे,
ले चले एक अनजान राह पर,
बोले छोटा रास्ता है,
मेरा गला सूख रहा था,
पानी दिया उन्होंने मुझे,
फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ,
बेहोश थी मैं शायद,
जब होश आया,
कुछ पीड़ा हो रही थी मुझे,
पड़ी थी निर्जन जंगल में,
थकी सी, निढाल सी,
लड़खड़ाते हुए उठी,
किसी तरह पहुँची घर,
माँ को बताया था सब,
वो भी रोयी थी,
समझाया था मुझे,
बेटा किसी को बोलना मत,
वरना बदनामी होगी,
शादी भी नहीं होगी,
मुँह बन्द कर दिया था मेरा,
उस इज्ज़त की दुहाई देकर,
जो शायद अब रही ही नहीं थी,
आखिर मैं ही क्यों चुप रहूँ,
किसी वहशी की गलती की सजा,
आखिर मैं ही क्यों भोगूँ,
सजा के हकदार तो वो अंकल हैं,
मेरे पिता समान थे वो,
कितना सम्मान करती थी मैं,
फिर भी मैं ही चुप रहूँ।,
आखिर कब तक चुप रहना होगा मुझे,
कितना जुल्म और सहना पड़ेगा मुझे,
आखिर कब तक घुट घुट के जीना होगा मुझे??
आपने ऐसा क्यों किया अंकल,
एक बार भी दया नहीं आयी आपको,
एक बार भी अपनी बेटी नहीं दिखी आपको,
मैं भी तो आपकी बेटी जैसी ही थी।

“सन्दीप कुमार”

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