Sep 15, 2016 · कविता
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निर्दोष बेजुबां का लाल खून….

निर्दोष बेजुबां पर
चली होगी जब कटार
तड़पा होगा
बदन उसका
दिल भी रोया होगा,
धरती हो गयी लाल
उस खून से
जो उस बेगुनाह से निकला होगा,
उस मासूम बेजुबां का
इंसान से एक सवाल
खून तेरा भी लाल है
खून मेरा भी लाल है,
मैं जानवर ही सही बस नाम का
मुझको न काटो
इंसान से तो अच्छा हूँ
कि नहीं भटकता
अंधविश्वास की गंदी गलियो में,
मिटा सकते हो तो मिटा दो
उस क्रूरता के जानवर को
उसके नाम निशां को
जो पाल रखा है सदियो से
ज़ेहन की क्रूर गलियो में,
मांग रहा निर्दोष लाल खून
अब इंसाफ है,
गुनाहगार कौन
बिलकुल पाक साफ है,
जो करेगा सो भरेगा
कुदरत के यहाँ इंसाफ है
कुदरत के यहाँ इंसाफ है।।

^^^^^^दिनेश शर्मा^^^^^^

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Dinesh Sharma
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सब रस लेखनी*** जब मन चाहा कुछ लिख देते है, रह जाती है कमियाँ नजरअंदाज... View full profile
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