निगाहें

निगाहों को निग़ाहों से धोका हुआ है ।
ज्यों जागकर भी कोई सोया हुआ है ।
झुकीं हैं निग़ाहें यूँ हर शख़्स की क्युं ,
ज्यों निग़ाहों का निग़ाहों से सौदा हुआ है ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@…

Like Comment 0
Views 4

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing