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‘निकम्मा’

निकम्मा
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राधेश्याम सरकारी नौकरी से रिटायर हो कर तकिये पर सिर रख कर छत को निहारते हुये सोच रहा था कि चलो सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर अब कुछ दिन आराम करेंगे।दोनों बेटों की शादी कर दी थी।बड़ा बेटा दिव्यांश सिले सिलाये (रैडिमेड) कपड़ों का व्यवसाय कर रहा है।बहुत अच्छा व्यवसाय चल रहा है।बीस लोग काम करते हैं उसकी फ़ैक्ट्री में। बहु भी बहुत संपन्न परिवार से है।बहुत पढ़ी लिखी और एम एन सी (बहुराष्ट्रीय कंपनी)में नौकरी करती है;अच्छी खासी तनख़्वाह है।नौकर चाकर हैं;कोई कमी नहीं।छोटा बेटा सुकांत आयकर विभाग (इन्कम टैक्स )डिपार्टमेंट में क्षेत्रीय प्रबंधक (ज़ोनल आफिसर) है।उसकी पत्नी भी सुशील और सुघड़ है।परंतु वह हमेशा दूसरे शहर में होता है क्योंकि नौकरी में स्थानंतरण होता रहता है।
राधेश्याम जी ने प्रसन्नता मन में भर ली।सीना गर्व से फूल गया।उसी गर्वोन्मत भाव लिये उन्होंने ज़ोर से नौकर को आवाज़ लगाई ‘अरे, फूले एक गिलास ठंडा मटके वाला पानी पिला’।फूल सिंह ने देखा घड़े में नीचे का पानी था और बाबू जी को ‘न बाबा न’। उसने तरकीब लगाई थोड़ा फ्रिज का थोड़ा ठंडा पानी और शेष सादा पानी मिला कर दे दिया।राधेश्याम जी ने लिया और गटगट करके एक साँस में पी गये।राधेश्याम जी को उनके मित्र और बंधु प्यार से राधे बुलाते और बच्चे पापा।वे परिवार में बड़े पापा के नाम से प्रसिद्ध थे।
रात का खाना खाकर वो सो गये।जब से पदमुक्त हुये तो जीवनशैली साधारण और खान पान केवल हल्का और पथ्यापथ्य का ध्यान करके।आधी रात को न जाने क्या हुआ कि खांसी हुई।धीरे धीरे बढ़ने लगी।अब खांसने की आवाज़ कमरे से बाहर न जाये तो चादर से मुँह ढक लिया।परंतु कहते है खांसी और प्रेम छिपाये नहीं छिपता।
बड़ा बेटा दिव्यांश रात को दौड़ता हुआ आया।बहु साथ में थी।क्या हुआ,पापा’? क्या कहीं बाहर गये थे! कुछ बाहर का तो नहीं खा लिया कुछ ठंडा या खट्टा।’ पापा जी ने बहुत सोच कर बताया ‘नहीं,बेटा आज तो मैं कहीं नहीं गया?घर पर ही था सारा दिन!’ठंडे के नाम पर एक गिलास मटके का पानी पिया था;चाहे तो कल फूले से पूछ लेना!’अब दिव्यांश अपने कमरे में गया।वहाँ से कफ सिरप उठा लाया।पापा जी को पिलाया।राधे जी को दस मिनट में नींद आ गई।
सुबह उठे तो शरीर में ताजगी नहीं थी।शरीर टूट रहा था पर बुखार नहीं था।जैसे ही नहाने बैठे,पानी का डब्बा सर पर डाला वैसे ही खांसी फिर शुरु।जैसे तैसे नहा कर बाहर आये।पाठ पूजा के लिये आसन लगाया कि नाक में धूप बत्ती की सुगंध चढ़ गई।और खांसी शुरु।दिव्यांशु आते ही जैसे फट पड़ा।’क्या ज़रूरत थी ठंडा पानी पीने की।अभी डाक्टर गुप्ता से एप्वाइंटमेंट ले देता हूँ ड्राईवर को लेकर चले जाना;अच्छे से चैकप करवा लेना।वापिस आकर शाम को मिलते हैं।अगले हफ़्ते शिपमेंट जानी है जरा जल्दी माल तैयार करवाना है।’
बेचारे राधे बाबु बैठे बैठे ऊंघने लगे।ड्राईवर ने आज छुट्टी कर ली।वो नहीं आया।अब इस हालात में खुद भी नहीं कर सकते ड्राईव।दिव्यांशु को फोन किया ‘बेटा एक कैब बुक कर दो’। वो फिर भड़क उठा ।”पापा इतना भी नहीं कर सकते;मैं फ़ैक्ट्री देखूं कि आपको। बीस आदमी शाम तक बेकार बैठ जायेंगे।”आप आटो करके चले जाना डाक्टर को पेमेंट कर दी है।मम्मी थीं को कितना आराम था।सारा घर संभाल रखा था।सुकांत भी हरदोई जा कर बैठ गया ना । यह नहीं कभी पापा की खबर ले लिया करे।”वह बुड़बुड़ाया मैने सोचा अब रिटायरमेंट के बाद फैक्ट्री बैठेंगे:ये तो निक्कमें होकर घर पर बैठ गये कि कुछ दिन आराम करूंगा।बीमारी लेकर और बैठ गये ।फोन अभी चालु था राधे जी ने सुन लिया सब।मन को जैसे धक्का लगा अब मैं ‘निकम्मा’ हो गया।
राधे जी जैसे तैसे कर घर से बाहर निकले ।आटो स्टैंड तक घिसट घिसट कर पहुंचे।आटो पकड़ कर डाक्टर के पास पहुँचे ।यह शुक्र है कि समय पर पहुंच गये।डाक्टर ने जाँच की,छाती पर स्टैथस्कोप लगाया।डाक्टर बोला ‘अंकल,कुछ नही हुआ।आप फ़िट हैं।गला ख़राब है दवा दे रहा हूं;कल तक ठीक हो जायेंगे।’ ठंडा और खटाई नही खाना।नमक डाल कर गरारे कर लेना।’मन में संतोष आया; चलो कुछ सकारात्मक तो है जीवन में।आटो पकड़ कर घर चले।रास्ते भर सोचते चले कि मैं ‘निकम्मा’ हो गया।दवा लेने के लिये पानी लेने को आवाज़ लगाने ही लगे थे ‘फूले,पानी गर्म करके लाना’। एकाएक याद आया उन्होंने आवाज़ लगाई’फूले इधर आना’। फूल सिंह आया।राधे जी भरे बैठे थे।उन्होंने पूछा’ओए,कल तुमने मुझे पानी कहां से दिया था?’फूले के काटो तो ख़ून नहीं;उसने डर से कांपते हुये कहा कि वो मटके का पानी खत्म हो गया था इसलिये थोड़ फ्रिज का पानी और थोड़ा सादा पानी मिला कर दे दिया था।’
यह सब सुनते हुये दिव्यांश पीछे से आ गया।थका हुआ वैसे ही था ऊपर से काम का तनाव।उसने आव देखा न ताव बस फूले के कालर से पकड़ा और धकेलते हुये उसे गेट की तरफ़ ले जाने लगा।’हमने तुम्हें ठीक ढंग से काम करने के लिये रखा है निक हमें बीमारी देने के लिये।बाबू जी को कुछ हो जाता तो!!’उसकी आँखों में आंसू आ गये।अपने प्रति दिव्यांश का यह प्रेम देख कर राधे जी से रहा नहीं गया।वे उठे और फूले को अलग किया और कहा ‘आगे से ऐसा नहीं करेगा।ग़लती किससे नहीं होती!’
फूलसिंह की नौकरी बच गई।मन में संतोष का भाव लिये राधे जी रात की दवा खाकर सो गये।सुबह उठे तो तरोताज़ा थे।जल्दी से नहा धोकर।,वे पाठ पूजा कर तैयार होकर बैठ गये।दिव्यांश कमरे से बाहर निकला। हैरान होकर बोला’ ‘कहीं जाना है क्या? मैं आपको छोड़ दूंगा!’ “अरे नहीं, मैं को तुम्हारे साथ फ़ैक्ट्री जाने के लिये बैठा हूँ!”राधे बाबू ने कहा।घर पर बैठ कर’निकम्मा’ बैठने से अच्छा है तेरे काम में हाथ बंटाऊं।मेरा समय भी अच्छा बीतेगा और आलस्य भी नहीं रहेगा।दिव्यांशु ने पिता के पाँव छूकर आशीर्वाद लिया और पिता को लेकर फ़ैक्ट्री के लिये निकल पड़ा।दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति मन ही मन प्रेम की धारा बह निकली।
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राजेश’ललित’
स्वरचित
मौलिक

Competition entry: साहित्यपीडिया कहानी प्रतियोगिता
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