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ना जाने कितनी बार

Bhupendra Rawat

Bhupendra Rawat

कविता

July 20, 2017

ना जाने कितनी बार मैंने अपनी
अंदर की इच्छाओं को दबाया।
लेकिन हर बार इच्छाओं का

बीज भीतर मेरे उग आया।
कभी मैं हँसा तो कभी

रोता हुआ खुद कों पाया।
लेकिन समय ने हर कदम
पर मुझे एक पाठ सिखाया।

समय के अनुरूप स्वयं
को ढालना आया।

ढ़लती उम्र के साथ नयी कोपल की
तरह इच्छा रुपी बीज भीतर उग आया।

लेकिन भीतर की इच्छा रुपी
प्यास को नही शांत कर पाया।

Author
Bhupendra Rawat
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।
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