नास्तिकता नकार या स्वीकार

धर्म की स्थापना वा
धर्म की हानि
दोनों का प्रकृति वा
अस्तित्व पर
एक समान नुकसान.

मनुष्य किसी भी विचारधारा का हिस्सा बनकर सर्वप्रथम निजत्व को अस्वीकार करता है.
जबकि आदमी तो है !
यह सत्य है !
तभी संसार वा ईश्वर.
इसी झूठ के कारण इंसान
जो है वह होने से चूक जाता है.
जमावड़े एक समान लय पैदा करने में जुटे हैं.
कैसी समानता ?
कौन सी लय ?
व्यर्थ वा फिजूल की बातों का नाम ही धर्म है.
धार्मिक होते ही आदमी रंग जाता है.
अपने स्वतंत्र विचारों का दमन करता है.
वह संसार पर बोझ बन जाता है.
खुद का दमन करता है.
पक्षपाती हो जाता है.
मुफ्तियों का गढ़.
चंद शातिर लोगों का जमावड़ा ही वो है
जिसे लोग तथाकथित धर्म, धार्मिक, पवित्र, सत्य,
न जाने किन किन नामों से पुकारते है.

खुद को तो जान लो !
मन एक विलक्षण तत्व है !
तभी तो जगत को जानना संभव होगा !

धार्मिक स्थलों पर जमा भीड़ .
धर्मगुरुओं के बढ़ते वर्चस्व ..
बिमार मानसिकता …
प्रश्नचिन्ह …संदेश ???
जवाब की तलाश में आज भी
भटक रहा इंसान.
*किंकर्तव्यविमूढ़*

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