Aug 6, 2016 · कविता
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नारी

नारी
खूब करें अपमान नारी का , झूठे वादे झूठी क़समें
नारे बाज़ी भी करते हैं , कैसी हैं थोथी ये रसमें।

आपस में जो बात भी करते, गलियाते माँ बेटी को
बैर भाव में जम कर होती, ज़ख़्मी माँ , बेटी ,बहनें ।

लाज शर्म की हद न रहती, भूल जायें सारे संसकार
बेटी बहु को गाली देते , बरसे झर झर गंदे नगमें।

कैसी राह चलें मेरे भाई, शर्मसार होती नारी
हमने कयूं है जनम दिया इन्हें , दुख लगा हमको लगने।

अनाचार यह कब थम पाये, कोई आसार नहीं दिखता
न जाने कयूं पुरूष समाज को , गाली देना ही भाये।

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Suksham Mahajan
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I am Retd. Principal from Delhi Govt and write in both HINDI &English.I actively write... View full profile
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