नारी

आल्हा छंद” युग्म गीतिका
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साहस शौर्य शक्ति की प्रतिमा ,
नारी का जग पर उपकार |
दुर्गा लक्ष्मी राजपुतानी ,
की गाथाये कहें पुकार |

जग को जीवन देने वाली ,
जिससे है जग में पहचान –
त्याग तपस्या की मूरत सी ,
नारी जग का है आधार |

लक्ष्मी बाई ,दुर्गा बन कर ,
करे शत्रुओं का संहार –
विकट परिस्थितियाँ हों चाहें,
करती नहीं हार स्वीकार |

मानव की पूर्णता प्रकृतिसे ,
बतलाते है वेद पुराण –
करुणा ममता प्रीत हृदय में ,
सहज बरसता प्रेम दुलार |

धन-दौलत का लोभ न करती,
तनिक नही करती अभिमान –
दुख सह कर हँसती रहती है ,
प्रेम पगा रखती व्यवहार |

मिटती रही कोख में नारी ,
कभी बन गया काल दहेज –
नर को जीवन देती है जो ,
मत कर तू उसको लाचार |

माँ की पूजा करने से ही ,
सच में खुश होते भगवान –
श्री हरि भी माँ की ममता के ,
ऋणी हुए लेकर अवतार |

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री है,
देती हर मुश्किल से त्राण –
आँच नहीं आने देती है ,
सीने पर सहती हर वार |
मंजूषा श्रीवास्तव
मौलिक रचना

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