नारी विमर्श

चटक लाल रंग
मांग में सिंदूर
मंगलसूत्र, चुड़ियाँ
माथे की बिंदीयाँ
सुहागन की हर निशानी
कितने प्रयत्न से
धारन कर
मैं, अभागन
कहलाई सुहागन,
परन्तु यह यतन
मुझ को
नहीं दिला पाये
स्त्री का सम्मान
प्रेम और मान
पुरूष के अहम्
बांछित इच्छायें
भोग, लालसा
और- परम्परा
समझे मुझे
उपयोगी सामान
दासी, अबला
असहाय एवम्
आश्रित मान
हर युग में
सहनी पड़ी
अग्नि परीक्षा
निर्यातन, अपमान
मैं- एक नारी
सृष्टि की अधिकारी
वंचित रहती
उपेक्षित सदा
यही रीत
चले सदीयों से
केवल कहने को
गरियसी नारी
भावी जननी हमारी

सजन

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