नारी - जग जननी

तू अबला नहीं जग जननी है
सबल, सकल जग शक्ति है
तूझसे ही तो सृष्टि आगे बढ़ रही
तू ही तो शिव की शक्ति है ।।

सम्मान तुझे मिलता मां का
बहन बेटी और अर्धांगिनी का
तू ही तो है हर घर की धुरी
चलता तुझी से संसार घर का ।।

सहनशील तो हो तुम बहुत
अत्याचारों को भी सहती हो
दहेज़ की आग में जलती हो
फिर भी इतने सुकून से रहती हो ।।

तुम ही तो हो प्रेम की मूरत
जन्म देती हो तुम जिसको
खिल जाता है चेहरा उसका
जब देखें वो तुम्हारी सूरत ।।

चाहे दिल में दबे हो दर्द हज़ार
अपनी खुशी बच्चों में ढूंढ लेती हो
ज़िन्दगी भी सूनी हो जाती है तब,
जब तुम अपनों से रूठ जाती हो ।।

मनाना भी तुम्हें मुश्किल कहां
ना कोई बात दिल पर लेती हो
एक पल में नाराजगी भूल कर
हर बात खुशी से मान लेती हो ।।

अब तो हर राह में आगे बढ़ रही तू
धरती के ऊंचे पहाड़ भी चढ़ रही तू
है राह में तुम्हारी बाधाएं बहुत लेकिन
फिर भी नई ऊंचाईयों को छू रही तू ।।

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