Oct 11, 2020 · कविता
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“नारी गरिमा”

दँश झेलती, लिँग भेद का,
फिर भी जीती जाती है।
नाम “बालिका” का पाकर,
कितने कर्तव्य, निभाती है।

कुत्सित नज़रों से बच-बच कर,
जीवन-पथ स्वयं बनाती है।
साहस, विवेक के दम पर वह,
आगे बस बढ़ती जाती है।

नारी गरिमा, नारी सँयम,
नारी, परिवार बनाती है।
नारी से ही, घर की शोभा,
नारी, सँसार सजाती है।

नित सुबह सवेरे, से उठना,
घर को वह स्वच्छ, बनाती है।
पति को, बच्चों को जल्दी से,
उत्तम जलपान, कराती है।

बनकर मशीन सा, इक रहना,
बिल्कुल भी नहीं, घबराती है।
ख़ुद की, हारी-बीमारी मेँ,
आराम कहाँ, कर पाती है।

मयके-ससुराल मध्य, सब दिन,
वह सामँजस्य, बिठाती है।
किँचित सँकट भी, आन पड़े,
झटपट, नारी सुलझाती है।

बच्चे को पहला, अक्षर भी,
वह माँ बनकर, सिखलाती है।
उज्ज्वल भविष्य की, चाहत मेँ,
झिड़की भी, उन्हें पिलाती है।

हो बाधा कितनी, विकट भले,
उसको न, डिगा तक पाती है।
यदि आँच मान पर, पति के हो,
वह रणचंडी, बन जाती है।

क्या दोष, पार्टी, किटी अगर,
सखियों सँग कुछ, बतियाती है।
कुछ यादों को कर, आत्मसात,
कुछ क्षण, बच्ची बन जाती है।

उद्गार हृदय मेँ, लिए प्रबल,
सँबल सबका, बन जाती है।
होँ अश्रुपूर्ण आँखें, फिर भी,
होठों से वह, मुस्काती है।

होँ सास-श्वसुर, या पतिदेव,
वह सेवा-धर्म, निभाती है।
उर “आशा”, सब मेँ, प्यार बढ़े,
सचमुच, कितना सह जाती है..!

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रचयिता-

Dr.asha kumar rastogi
M.D.(Medicine),DTCD
Ex.Senior Consultant Physician,district hospital, Moradabad.
Presently working as Consultant Physician and Cardiologist,sri Dwarika hospital,near sbi Muhamdi,dist Lakhimpur kheri U.P. 262804 M.9415559964

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