Aug 30, 2016 · कहानी
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नायलॉन का मोजा/या एक साधारण ग्रहणी

सुबह सुबह आठ बजे घंटी बजी ..जाकर दरवाजा खोला तो देखा सफाई वाला मजदूर था ..

माह मे एक बार आकर घर की सफाई कर जाता है .
.खैर मै अंदर बुलाकर उसे काम समझाने मे लग गई ..तभी पति की आवाज आई क्या बात है भई ! चाय नही मिलेगी क्या ? मै उसे काम समझाकर जल्दी से रसोई मे आ गई और झटपट चाय बना कर पति को दी
तभी माता जी की आवाज आई कहॉ हो बहू ? (पापा जी जो
पच्चासी वर्ष की उम्र के पडाव मे है ..अपना मानसिक संतुलन खो चुके अपनी दैनिक क्रिया भी नही कर पाते ) मॉ के साथ लग कर करवाना पडता है ..मैने मॉ जी की मदद की और पापा जी को तैयार करके उन्हे चाय दे ही रही थी की पतिदेव की आवाज आई ..आज जरा जल्दी जाना है नाश्ता जल्दी बना देना ……
मैने झटपट नाश्ता बनाना शुरू कर दिया तभी मुझे याद आई कि अरे एक बार मजदूर को तो देखू ..देखा तो वो सुस्ता रहा था ..मैने झाड लगाई और अलमारी से सारी चीजे हटा कर उसे साफ करने का निर्देश देकर फिर से अपने काम मे लग गई ..
खैर पति को नाश्ता देकर उन्हे दफ्तर का बैग देकर विदा करते हुए सोचा कि सुबह से भागते दौडते एक मिनट की फुर्सत नही मिली की चाय पी सकू !
_यही सोचते हुए चाय का पानी गैस पर रक्खा ही था कि फिर घंटी बजने से तन्द्रा भंग हुई ..कौन आया होगा ..सोचते हुए दरवाजा खोला ..सामने दूर के रिश्ते की बुआ सास और एक पैन्ट कमीज मे आधूनिक सी लडकी थी मैने झुक कर प्रणाम किया तो उन्होने भी गलेलगाकर प्यार किया एवं अपनी बहू से परिचय कराया ..कि दफ्तर मे नौकरी करती है . उसे देखकर एक हूक उठी की ..काश मै भी नौकरी करती !!
खैर उन्हे मॉ जी के पास बैठा कर मै रसोई मे आ गई .
.मॉ जी की आवाज आई बहू चाय नाश्ता लगा दो ..अरे कुछ बना लेना बहू आई है
वहॉ से बातो की आवाजे आ रही थी बुआ जी बहू की तारीफ करते हुए कह रही थी अच्छा कमा लेती है बहू
.घर के काम काज के लिए पॉच हजार मे नौकरानी रख ली है ..सारा काम कर लेती है ..
यह सुनते ही मेरा दिल खटक गया
..क्या मेरी हैसियत एक नौकरानी के बराबर मात्र है .

.मैने दिमाग को झटका ..और चाय नाश्ता लेकर वहॉ पहुंची ..
बुआजी ने बडे ही ठसक अंदाज से पूछा नौकरी करती हो .या ..घर पे ही …………

मैने कहा नही मै एक”
,आम ..साधारण सी ग्रहणी हूं

कहते कहते मन मे कुछ दरक गया!!

..दिल मे कुछ चटक गया!!

तभी फोन की घंटी से चौक गई ..पति का फोन था ..कुछ काम से दफ्तर बुलाया ..
घर मे इतना काम पर हुक्म हुआ तो जाना ही था ..अंग्रेजी मे स्नातक हूं तो दफ्तर सम्भाल लेती हू

..झटपट तैयार होकरदफ्तर केलिए निकल गई ..लौटते लौटते दो घंटे लग गए ..सबका दोपहर का खाना निबटाते हुए शाम हो गई उधर मजदूर का काम भी हो ही गया था ..सारे कपडे जो अलमारी के बाहर थे उन्हे सम्हालते समय हाथमे एक नॉयलॉन का मोजा आगया ..सोचने लगी क्या मेरी हालत भी

क्या इसी नॉयलॉन के मोजे की तरह नही है?

जब चाहो जहॉ सेट कर लो ..

क्योकी ,’मै एक आम साधारण सी ग्रहणी हूं ‘…..

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे... View full profile
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