मुक्तक

नाज-नखरे व लटके-झटके,
कभी पसंद न आई।
एक मोहिनी भोली सूरत
दिल में रही समाई।
गजब सादगी में सुन्दरता
मन विचलित कर जाए-
शर्म हया का पहने गहना,
नज़रें खड़ी झुकाई।
-लक्ष्मी सिंह

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