कविता · Reading time: 1 minute

नाचतीं काली घटाएँ थिरकती बरसात

नाचतीं काली घटाएँ थिरकती बरसात है
इक कहानी बनके आई ये सुहानी रात है
झूमता फिरता पवन बिन साजन
जिया मे आग लगावे नशीले झोंके
नैनो मे विरह के घन बरसते
उमड़ते-गरजते चले आ रहे घन
घिरा व्योम सारा कि बहता प्रभंजन,
अंधेरी उभरती अवनि पर निशा-सी
घटाएँ सुहानी उड़ी दे निमंत्रण!
कि बरसो जलद रे जलन पर निरन्तर
तपी और झुलसे दिल की धरती दिन भर,
करो शांत प्रत्येक कण आज शीतल
हरी हो, भरी हो मन की प्रकृति नव्य सुन्दर!
झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी हो
जगत-मंच पर सौम्य प्रियतमा खड़ी हो,
गगन से झरो मेघ ओ! आज रिमझिम,
बरस लो सतत, मोतियों-सी लड़ी हो!
चाहा था कि भीगें तेरी बारिश में हम मगर
अपने ही सुलगते हुए ख्वाबों में जले हैं।
सीने में समुन्दर के लावे सा सुलगता हूँ
मैं तेरी इनायत की बारिश को तरसता हूँ
इक कहानी बनके आई ये सुहानी रात है
नाचतीं काली घटाएँ थिरकती बरसात है
।।कांत।। सुरेश शर्मा

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