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"नाक"

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“नाक”
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दर्ज़ा होंठों के ऊपर का,
अगल-बगल रहती दो आँख ,
खडी बीच मे बडी शान से,
देखो रौब जमाती नाक ।

किसी-किसी की लम्बी होती,
किसी –किसी की चपटी नाक,
किसी किसी की हुक्के जैसी,
बेढब सी इतराती नाक ।

गन्ध अनेकों पल में जाने,
चश्मा खूब सँभाले नाक,
कभी-कभी तो सँभल न पाती,
सर्दी में जब आती नाक ।

कभी किसी को बुरा कहो तो,
उसको फ़िर लग जाती नाक,
अगर कभी मन की ना हो तो,
बिगडे मूड, सिकुडती नाक ।

इज्जत का पर्याय हो चु्की,
बेइज्जत हो कटती नाक,
सीखो प्यारे, नाक बचाना,
बडे काम की होती नाक ।

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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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हरीश लोहुमी
हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो...
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