नही चाहता पुनर्जन्म अब,

नही चाहता पुनर्जन्म अब,
न फिर मानव तन पाऊँ।
ऐसी योनि देना भगवन,
परहित धरम निभा पाऊँ।।

भाई-भतीजा मेरा-तेरा,
करते-करते थक गया हूँ।
दंभ-झूठ पाखंड के पथ पर,
चलते-चलते थक गया हूँ।।
इन सब से मुक्ति दो दाता,
अपना कर्म निभा पाऊँ।
अन्य जीव-जंतु की तरहा,
अपना धर्म निभा पाऊँ।।

रचनाकार ने सृष्टि रच कर,
स्वर्ग बसाया धरती पर।
योनि मानव की रच भेजा,
सरताज बनाया धरती पर।।
परवरदिगार भी सोच रहा,
अब कैसे मुक्ति मैं पाऊँ।
मानव को दानव बनते देख,
देवत्व पे अपने शरमाऊँ।।

रक्षक ही भक्षक बन बैठा,
अब प्रकृति भी थर्राए।
वसुधा का दम घुटता देख,
अब रचनाकार भी घबराए।।
दीन-दुखी व जीव-जगत की,
पीड़ा सब हरता जाऊँ।
सरिता पाहन तरुवर बनके,
निश्छल सेवा करता जाऊँ।।

अगर दिया फिर पुनर्जन्म तो,
मुझको वृक्ष बना देना।
समभाव रहे सब जीवों पर,
वृहद वक्ष बना देना।।
परहित करते-करते प्रभु अब,
समरसता सिखला जाऊँ।
निर्मल अविरल भाव लिए अब,
सरिता सम बहता जाऊँ।।

नही चाहिए जीवन जिसमें,
मक्कारी-गद्दारी हो।
भले बना दे स्वान या खच्चर,
जिसमें बस खुद्दारी हो।।
जाति भाषा मजहब सरहद,
से “कल्प” ऊपर उठ जाऊँ।
कूड़ा करकट पत्थर बन के,
जीवन सफ़ल बना जाऊँ।।

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अध्यापक B.Sc., M.A. (English), B.Ed. शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय साईंखेड़ा Books: सम्पादक कल्पतरु - एक पर्यावरणीय...
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