नही कन्या भ्रूण गिराउंगी

नही कन्या भ्रूण गिराउंगी ,

मेरे अनगढ़ सपनो को माँ ,तुमने ही आकार दिया।
जन्मा मुझे कोख से अपनी, अतुल्य ये उपकार किया।
देख रही थी गर्भ से मैंभी , चुपचाप तुम्हारी उम्मीदे
तेरे मन की घुटन की आँच, रुदाली सी तस्वीरे।
सुना था मेने भी अट्टहास वो ,जो मुझे मारने आतुर था
सारा समाज तुझ पर माँ ,कलंक लगाने आतुर था।
बेटी जनकर कुलकलंकनी , जब तुझे ठहराया था
लेकिन मुझमे तूने तब भी ,स्वाभिमान जगाया था।
कितना दर्प था तब चहरे पर ,जब गोद मुझे उठाया था।
पग पग पर तूने ही मुझमे ,अपना विश्वास जगाया था।
देखा था मेने बचपन मे ,तुमने जो कष्ट उठाये थे।
मुझे पढाने की खातिर ,माथे पर बोझ उठाये थे।
सीख रही थी मैं भी चुपचुप ,अपनी आन निभाना माँ।
अपनी बेटी के ख़ातिर ,रूढ़ियों से टकराना माँ।
है वादा तुमसे ये मेरा, रीत तेरी ही निभाऊंगी।
जन्मे कोख से मेरे बिटिया ,उसे तेरी तरह बनाउंगी।
लीक नई जो तुझसे सीखी ,वही रीत दोहराउंगी ।
लाख कहे दुनिया तो क्या ,नही कन्या भ्रूण गिराउंगी ।
साथ न दे कोई तो क्या,खूब उसे पढ़ाऊंगी।
उठे लाख सवाल फिर भी, हर रूढ़ि से टकराउंगी।

विजय लक्ष्मी जांगिड़ “विजया”
जयपुर

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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