नहीं होता है तबतलक सवेरा

नहीं होता है तबतलक सवेरा ।
धरे मोबाईल जबतलक न इन्सान ।।
रात से दिन तक जब तक न थकले।
मोबाईल पकड़ा रहता है इन्सान ।।
छुप-छूपाकर वॉट्सऐप खोले।
मैशेज देख ही कुछ भी बोले।।
पहले मोबाईल को खोले सुबह-शाम।
तब ही कर सके कोई भी दूजा काम।।
मिल जाए कोई त्योहार या छुट्टी ।
चाहे दुनिया से ही हो जाय कुट्टी ।।
मैशेज टपक रहे हैं हर पल तड़-तड़।
मानो बह रही हो झरना कल-कल।।
सर पे परीक्षा का फूटने को चाहे ही हो बम।
पर वाट्सएप ग्रुप में दिखना है हरपल हरदम।।
माता-पिता हैं खूब हरदम गुस्साते।
परीक्षा के भय से प्रतिदिन खूब डराते ।।
नेत्रज्योति चाहे होता जाय हरपल गौण।
सोशल मीडिया पर रहना ही है औण।।

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