गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

नहीं मिले।

रद़ीफ़- नहीं मिले।

क्यों इक हसीं ख्वाब सी है, किताब जिंदगी
जब चाहा इसे पढलें तो साबूत पन्ने ही नहीं मिले।

ढूंढा किए बहुत ज़ीस्त-ए-किताब में,
मग़र दिल को दें सुकून, वो लम्हे नहीं मिले।

हम देखते रहे,हर पन्ना पंख लगा के उड़ गया,
गिनते रहे हम बेसुध,पर हिसाब नहीं मिले।

देते जो साथ इश्क का ग़म की बयार में,
रखते थे आस जिनकी, वो साथी नहीं मिले।

घूमा किए थे लेकर जिगर अपना हाथ में,
दे देते जिन्हें हंसकर वो सरताज नहीं मिले।

हाय, क्यों उड़ गया हर पन्ना मेरी किताब से,
मांगा किए खुदा से भी जवाब नहीं मिले।

जीवन के अनकहे राज़ का है हिसाब जिंदगी,
जो हम को बख्शे ज़ीस्त ने वो खिताब नहीं मिले।

जो तोड़े आस-विश्वास आशिक का प्यार में
नीलम ऐसी भी हज़ाब किसी को नहीं मिले।

नीलम शर्मा

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