कविता · Reading time: 1 minute

नहीं पता

मुझे मंज़िल का नहीं पता
मुझे रस्ते का नहीं पता

चला जा रहा हूँ बस सुर एक है…
मुझे जंगल का नहीं पता
मुझे मंगल का नहीं पता

अभी तो चलना शुरू किया है मैने…
मुझे सरल का नहीं पता
मुझे विरल का नहीं पता

मैं खुद में इक कीडे सा हूँ इस जहाँ में…
मुझे लहरों का नहीं पता
मुझे कहरों का नहीं पता

चाहत है बस उजाला ही उजाला हो…
मुझे सवेरे का नहीं पता
मुझे अँधेरे का नहीं पता

____________________________बृज

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