नहीं चैन में कोई, छोड़ दो कक्का बीड़ी /सूरज नाम परंतु, पी रहे बुद्धू-बीड़ी

बीड़ी औ सिगरेट पी, पत्नी को दें ज्ञान|
कहें नहीं दिखला मुझे, मद की ऊँची तान||
मद की उँची की तान,दिखाती खाकर मेरा|
नाती से कह रही ,नशेड़ी बब्बा तेरा||
कह “नायक” कविराय,पकड़ माया की सीढ़ी|
नहीं चैन में कोई, छोड़ दो कक्का बीड़ी||

बीडी-गुटखा वाँटते, मैैला धूम्र अपार|
काका रोज डकारते, फुप्फुस हैंबीमार||
फुप्फुस हैं बीमार, स्वाद मुँह का कुछ खारा|
जकड़ें रोग अपार ,’स्वच्छ भारत’ है नारा||
कह “नायक” कविराय, दुखी है सारी पीढ़ी|
सूरज नाम परंतु, पी रहे बुद्धू-बीड़ी||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

-गुटखा=कटी सुपारी ,कत्था,तंबाकू एवं चूना का मिश्रण जो पैक किया हुआ बाजार में मिलता है |
(एक नशीला मिश्रण)
-फुुप्फुस= फेफड़ा

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