नशा नाश की जड़ है

नशा नाश की जड़ है,खाए जीवन मूल।
दूर रहो सुख पाओ,करना कभी न भूल।।

मान शान यह घर का,ख़ुशियाँ लेता लूट।
रोज-रोज का झगड़ा,डाले सबमें फूट।
अंत बुरा हो तन का,रोगों के अनुकूल।
दूर रहो सुख पाओ,करना कभी न भूल।।

शौक़ एक दिन ये,लत बन जाती यार।
चाह छोड़ने की,फिर तो जाती हार।
फूलों जैसा जीवन,कर देता है शूल।
दूर रहो सुख पाओ,करना कभी न भूल।।

मौत-मौत से पहले,देता है ईनाम।
बुद्धिमान तुम बन,पीना न कभी जाम।
हँसता जीवन सादा,नशे भरा है धूल।
दूर रहो सुख पाओ,करना कभी न भूल।।

नशा नाश की जड़ है,खाए जीवन मूल।
दूर रहो सुख पाओ,करना कभी न भूल।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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