Jun 27, 2016 · कविता

नव विहान

नव विहान
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नव विहान नव ऊर्जा लेकर,
जगत पटल रोशन करता है ।
व्यग्र-तृप्त, हर्षित-विशाद पर
मानस नित दोलन करता है ।।

पंछी गण नव कलरव लेकर
गीत विहंगम नित्य सुनाती ।
जीवन के हर श्रृंग-गर्त को
समय सरि दोहन करती है ।।

निद्रित चेतन सर्द अनिल से
जागृत नित नूतन करता है ।
सत्व अनल सम आत्माग्नि को
सात्विक संशोधन करताहै ।।

सत्य और देवत्व हृदय में
नित्य ही आवाहन करता है ।
न्याय प्रेम की गुणवत्ता की
आत्मा नित मंथन करती है ।।

मानव में मानवता लाओ
जीवन के समरसता लाओ ।
बनके नित विनीत विनय ही
देवों सा जीवन बनता है ।।

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सामरिक अरुण
NDS झारखण्ड
27/04/2016

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अहम् ब्रह्मास्मि
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