नव रूप.....बेटियाँ

माँ अम्मा या हो आई हर रूप में बेटी समाई
बेटी बनकर दुर्गा आई झाँसी की रानी वो लक्ष्मी बाई
परम रुद्राणि परम ब्रह्माणि सत्यता की आकाश वाणी
रह गये दंग देखकर वो अद्वितीय शूरमायी

परिवार रूपी ध्वजा का चक्र चाहे हो तुम्हरा भाई
मगर तीनों रंगों में सिर्फ बेटियाँ ही समाई
हरित वसुंधरा का उर तुम शुभ्र शुचिता तुम में समाई
रंग केसरिया की बानगी देख तुम्हें इठलाई
घिर गया राजपूत बीच समन्दर जीवन की माँग रहा दुहाई
उसे बचाने बेटी आई और वो कहलाई जग मेहाई
अपने पुत्र का देकर बलिदान मेवाड़ की लाज बचाई
वो भी थी एक वीर बेटी पन्ना धाय वो कहलाई
क्या सुनाएं गाथा बेटीयों की कोई ना कर पाया उनकी भरपाई
पराक्रम की पराकाष्टा को मात देने बेटियाँ आई
चाहे दौड़ की हो उड़नपरी या कुश्ती की आज़माइश
स्वर्ण पदक दिलवाने में सबसे आगे बेटियाँ आई
तुम गर्व हो जुनून हो सॄष्टि सॄजन की अगुआई
हे नर श्रेष्ठ कन्या हत्या की ना करना भूल भारी
मिट जाएगा अस्तित्व तुम्हारा घड़ी वो होगी प्रलयकारी
प्रकृति की है धरोहर इन्हें देख वो हरषाई ये प्यारी सी बेटियाँ
है मेरी ही परछाई है मेरी ही परछाई ….।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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