कविता · Reading time: 1 minute

नवगीत

नवगीत हूँ मैं

यदि नई कविता हो तुम
संचेतना !
नवगीत हूँ मैं
यदि हो तुम मधुरिम गजल
परिकल्पना !
जनगीत हूँ मैं

यदि विनय की आरती तुम, हवन हो
मैं दीप हूँ
तुम धरा की हो नदी यदि सागरिक
मैं द्वीप हूँ
यदि हो तुम मंथन सजल
संवेदना !
नवनीत हूँ मैं

यदि हो तुम निर्दोष निर्झर का घटक
मैं विकल हूँ
तुम किसी भी शब्द की यदि द्वारका
मैं द्विकल हूँ
यदि हो तुम मंचीय रथ
अभिव्यंजना !
पथ-गीत हूँ मैं

यदि समय की माँग तुम हो सामयिक
मैं तथ्य हूँ
गद्य हो तुम आधुनिक यदि आंतरिक
मैं पद्य हूँ
यदि हो तुम चित्-नव्यता
नव सर्जना !
संगीत हूँ मैं

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
मेरठ

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