कविता · Reading time: 1 minute

नवगीत

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बहरी नहीं है
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बह रही है जो नदी
बहरी नहीं है
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यह जनम से बोझ ढोती
गंदगी के सावनों का
युग-युगों से अनय सहती
उन्नयन के धावनों का
है जहर से भर रही
जहरी नहीं है
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रीति सम्मत अर्थियों की
धर्म-ध्वजता ढो रही है
नैकटिक विश्वास का वह
प्रेम आटा पो रही है
भर रही है अर्घ्य से
गहरी नहीं है
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स्वयं अपने स्रोत-मुख से
झरझराती आ रही है
भूमि के तल पर अलौकिक
व्याहरण फैला रही है
शहर में है किन्तु वह
शहरी नहीं है
*
नित नये अवरोध का वह
दाब अनगिन सह रही है
यह कथा सदियों पुरानी
जनहितैषी कह रही है
रोकता है बाँध, वह
ठहरी नहीं है
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*
शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
मेरठ

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