नवगीत

लोकतंत्र का रामायण
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लोकतंत्र का रामायण है
कभी न बाँचा
सत्ता का उत्कर्ष

शिव आदर्श-उदाहरणों के
बदल गये हैं अर्थ
शब्द-शक्ति भी नाटकीय है
भाव हुये असमर्थ
तुलनाओं का गुणनखंड भी
कभी न जाँचा
जातिवाद-संघर्ष

राजनीति की नीति भयंकर
समझ न पाये वोट
विज्ञापन का लाभ उठाकर
पैठ बनाये नोट
दुविधाओं का गहन पैंतरा
आँचा-पाँचा
बदल गया निष्कर्ष

मापदण्ड की इन गलियों का
भार उठाता आम
एक शपथ की गीता पढ़कर
पनप रहा है पाप
लोक-काव्य कुछ समझ न पाया
निर्गुट ढाँचा
जनता का अवमर्ष

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
मेरठ

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