नवगीत

शिशिर अब, रोमांस नहीं ,
गुनगुनाती धूप में ।

आँख की गहराई में
आँसुओं का जलधि है ।
ज्वार- जैसा उछल जाना
सदा इसकी. नियति है ।
वर्जना की काई चिपकी,
आत्मा के कूप में ।

नाक की गहराई में ,
घृणा की ही गंध है ।
फैल जाए गंध यह तो,
युद्ध का अनुबंध है ।
व्यथित मन आता नहीं,
पुन: मूल -स्वरूप में ।

कान की गहराई में ,
स्वार्थ का ही शोर है ।
शोर भी यह फैलता ,
आज चारों ओर है ।
भेड़िये ही गरजते हैं ,
शेर के छल – रूप में ।

ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

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