नयें युग का बदलाव

नया युग सा आया हैं ,जर्रा इसकी बौछारें देखना।
हाल- ए- हाल बदलने से देश का आईना देखना।।

नया युग सा आया हैं, जर्रा अब मिजाज देखना।
रंग-ए -रुख आज शौहरत का तुम ताज देखना।।

बंदिशगी नहीं फिर भी तुम तो लिहाज नहीं रखते।
ये आजादी कैसी अपने देश में विदेशी बाजार चलते ।।

राह तुम लेलों पर इसकी तुम ना ही डगर बदलों।
अपनें -ए- दिलों में थोडा स्वदेश ही मगर रखलों।।

इस युग में संस्कृति का थोडा सा ही ख्याल रखलों।
नया युग कहकर देश की आन -शान ना ही बदलों।।

युग की रंग-शाखत सब सी बदल दी इस आरजू में ।
जमाना में बदलन में बचा न कोई बंध अब बाजु में।।

युग लौटने की मन्नत किस्से करू जरा तुम बता दों।
ऐ – यारों तुम न बदलकर मुझे तो वहीं युग लौटा दो।।

बदलने चलें *रण* कों जीवन की इस किरनार पर।
लिहाज की इज्जत ही तो सदा रखी अपने ऊपर।।

अजीक्कत सी दिक्कत हैं मुझे यारों नयें श्रृंगार पर।
क्योंकी इसकी प्रतिक्रिया सदा देशको देती रही चक्कर।।।

रणजीत सिंह “रणदेव” चारण
मुण्डकोशियां
7300174627

Like Comment 0
Views 144

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119