नयी सुबह नयी भोर

समंदर के किनारे पर बैठे हुए निराश
सूरज को डूबते हुए देखकर सोचता हूँ
ज़िंदगी भी क्या रंग लाती है
सरसों सा पीला कभी, चटख लाल फिर
और अंधेरी काली रात फिर चढ़ आती है

चहचहाते हुए पंछियों का एक झुंड
अपने घौंसले की तरफ जाता हुआ
और दूर कोई मांझी अपनी नाव पर बैठा
मोहन सी बंसी बजाता हुआ

कल फिर उठेंगे ये पंछी और ये मांझी
फिर बढ़ निकलेंगे अपनी मंज़िल को और
खुशियाँ भरने को अपनो के जीवन में
ये मन लगा कर काम करेंगे पुरज़ोर

तो ऐ इंसान तू क्यूँ घबराता है
मेहनत ही तो वो रास्ता है
जो खुशियों को पता है

उठ बढ़ निकल फिर तू राह पर
ऐ हारे हुए उदास मन
तू चल पड़ अपनी खुशियों की और
कर लगन और मेहनत से किस्मत अपने काबू में
फिर एक नया दिन होगा, होगी फिर एक नयी भोर

–प्रतीक

1 Like · 1 Comment · 189 Views
मैं उदयपुर, राजस्थान से एक नवोदित लेखक हूँ। मुझे हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखना...
You may also like: