नयी विधा के पुरोधा कविवर रमेशराज +डॉ. रामकृष्ण शर्मा

नयी विधा के पुरोधा कविवर रमेशराज
+डॉ. रामकृष्ण शर्मा
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साहित्य जीवन का सबसे बड़ा सत्य भी है और शृंगार भी | यदि आदर्श आदमियत की कोई सबसे बड़ी निशानी है तो वह साहित्य ही है | समस्त जीवन-मूल्य साहित्य की ही सन्तति हैं | ‘ सत्यं-शिवं-सुन्दरम् ‘ इन तीनों का समवेत रूप भी साहित्य में दिग्दर्शित होता है | साहित्य वह खजाना है जिसमें पारखी एक से एक बहुमूल्य रत्न खोज लेते हैं | यह भी निर्विवाद सत्य है कि साहित्यकार से बढ़कर कोई जीवन का पारखी नहीं होता और न ही नूतनता का अन्वेषी | नयी-नयी खोज साहित्यकार के स्वभाव में सहज रूप से निसर्ग-प्रदत्त प्रतिभा के प्रतिफल कहे जा सकते हैं | अतिशय प्रतिभाशाली एवं प्रखर कारयित्री मेधा से अभिमंडित साहित्यकार नई विधाओं के पुरोधा भी बन जाते हैं | कविवर श्री रमेशराज ऐसे ही साहित्यकार हैं जिनकी दृष्टि नूतन क्षितिजों का अन्वेषण करती है | हिंदी-साहित्य में तेवरी जैसी नितांत नूतन विधा का अन्वेषण एवं स्थापन इनका ऐसा योगदान है जिसे आगामी शताब्दियाँ याद रखेंगी | इस अनूठी विधा में लिखित इनकी अठारह पुस्तकें अपने आप में एक कीर्तिमान है |
सद्यः प्रकाशित “ जय कन्हैयालाल की “ [ लम्बी तेवरी-तेवर-शतक ] हस्तगत है | प्रथम संस्करण-2015, मूल्य 40 रूपये, सार्थक-सृजन प्रकाशन अलीगढ़ द्वारा प्रकाशित है | मात्र 15 पृष्ठों की लघुकाय पुस्तक है किन्तु कथ्य और कौशल दोनों की दृष्टि से बेजोड़ एवं अनूठी है | कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ |
रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह –
जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की
नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !!
व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है-
ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का
लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण –
खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है
सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है –
केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी
भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
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आये वृक्ष रोपण को ऊधौ आज लोग जो
काट रहे डाल-डाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
कुल मिलाकर यह एक अपूर्व प्रयोग है, नूतन अन्वेषण है तथा हिंदी काव्य के क्षेत्र में एक नयी राह है | इस पर अनुगामिता निसंदेह एवं अपरिहार्य है जो रमेशराज को एक पुरोधा का स्थान देगी | बधाई |
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डॉ. रामकृष्ण शर्मा, सरस्वती-सदन, मौहल्ला-कौड़ियान, भरतपुर [राज.] मोबा. – 9351698489

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