कविता · Reading time: 1 minute

नयी नस्लों के बोल

कहाँ पर बोलना हैऔर कहाँ पर बोल जाते हैं।जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।कटे जब शीश सैनिक का तो हम खामोश रहते हैं।
कटा एक सीन पिक्चर कातो सारे बोल जाते हैं।।
नयी नस्लों के ये बच्चे जमाने भर की सुनते हैं।
कुछ बोले तो बच्चे बोल जाते हैं।।
बहुत ऊँची दुकानों में कटाते जेब सब अपनी।मगर मज़दूर माँगेगा तो सिक्के बोल जाते हैं।।अगर मखमल करे गलती तो कोई कुछ नहीँ कहता ।
फटी चादर की गलती होतो सारे बोल जाते हैं।।
हवाओं की तबाही को सभी चुपचाप सहते चिरागों से हुई गलती तो सारे बोल जाते हैं।।
बनाते फिरते हैं रिश्तेजमाने भर से अक्सर।
मगर जब घर में हो जरूरत तो रिश्ते भूल जाते हैं।।
कहाँ पर बोलना हैऔर कहाँ पर बोल जाते हैं।
जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।

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