Jun 10, 2021 · कविता
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नया ज़माना आ गया !

नया ज़माना आ गया !
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नया ज़माना आ गया !
मौसम सुहाना आ गया !
बाहर निकलके देखा तो….
होश ही ठिकाना आ गया !!

आपस की ही लड़ाई थी….
बच्चे और बूढ़े भिड़ चले थे !
बूढ़े जहाॅं नियमों पे टिके थे ,
बच्चे ताक पर जिसे रखे थे !!

ये किसी युग का परिवर्तन है….
या संस्कृति का कोई विलोप है ?
सोच – सोच का प्रकारांतर है ,
या किसी नये युग का कोई योग है !!

कैसे – कैसे हैं लोग इस युग में ,
अपनी पहचान मिटाने पे तुले हैं !
जब कोई मसले आते विचारार्थ,
ग़लत का साथ देने में ही लगे हैं !!

बात-बात में देते आधुनिकता का हवाला !
जुटा तो नहीं पाते दो वक्त का भी निवाला !
कहाॅं तक ले जाएगी ये घिसी-पिटी सोच उन्हें,
यह तो बता सकते हैं उन्हें बस *ऊपरवाला* !!

_ स्वरचित एवं मौलिक ।

© अजित कुमार कर्ण ।
__ किशनगंज ( बिहार )
दिनांक : १०/०६/२०२१.
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Ajit Kumar Karn
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