नयना ! बिन कहे सब कह जाता .

नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
ठेस लगे तो छलक पड़े ,और खुश हो तो मुसकाता .
नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
कितनी हसीं है दुनिया सारी , कुदरत की हर शै है न्यारी .
चाँद सितारे , धरती – गगन ,और सुंदर मुरति – सूरत प्यारी .
सब कुछ है आंखों की बदौलत ,नयन बिना क्या होता .
नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
देने वाले ! क्या कर डाला ,आँख दिया पर ज्योति न डाला.
इनके लिए क्या दिन -क्या रातें ,कैसा अँधेरा – कैसा उजाला .
जानें कुछ लोगों को रब क्यूँ ,ऐसा दिन दिखलाता .
नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
जाते -जाते काम जो कर गये ,अंधों पर एहसान जो कर गये .
ऐसे लोग मरेंगे कैसे , अपनी आँखें दान जो कर गये .
काश ! सभी ऐसे हो जाते ,अंधापन मिट जाता .
नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
ठेस लगे तो छलक पड़े ,और खुश हो तो मुसकाता .
नयना ! बिन कहे सब कह जाता .
—— सतीश मापतपुरी

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