ढूंढ़ेंगे तुम्हे.....

गुम गये हो पर यकीं है
खुश हो तुम जहां भी हो..
कितना शोरगुल है
यहां शहर की हर गली मे
चीत्कार ख़ौफ है …
तुम्हारा अब होना न होना
मुझे लगता है बेकार है
मुमकिन है तुम कर्बला तक
पहुंच गये होगे
और अब पलट कर
देखना नहीं चाहोगे
जाओ चले जाओ दूर बहुत दूर
जहां से आये थे वहीं कहीं
फिर न आना दोबारा
शायद याद तो किया गया होगा
तुम्हे कुछ कोरे पन्नों मे
स्याही खर्ची गयी होगी
तुम्हारे लिये मेरी तरह ही
कुछ लोगों ने समय दिया होगा
तुम्हारा अर्जमंद रुतबा
सदा सदा के लिये याद किया जायेगा
मगर इस बार जरा व्यस्थता ज़्यादा है
कहीं विरोध ,कही बलात्कार ,
कहीं सत्ता मे उथल पुथल
तुम्हे तनिक याद करने का वक्त नहीं मिला
जायसी तक लपेटे मे आते आते बचे हैं
पद्मावती ने देश की हर खबर
हर एक व्यथा को
ओवर टेक कर लिया है
किन्तु फिर भी तुम निराश न होना
मां को याद है
उसके बेटे का जन्मदिवस
भारत मां की तरफ से
तुम्हे चिर्आयु होने का आशीर्वाद
तुम कभी न मरे हो न मरोगे …
तुम दीर्घायु हो
बस तुम्हे “नेता जी “नही कह सकती
नेता कई हैं अब यहां
किन्तु तुम?…..
मेरी कलम शत् शत् नमन करती है
तुम सदा रहना जीवित
ताकि कोई तुम्हे
फूलों का हार चढा
सैल्फी लेने और देशभक्त होने का
ढ़ोग न करे …….
वक्त मिलते ही ढूंढ़ेगे तुम्हे
सब साथ मे ..बस अभी नहीं
अभी तनिक व्यस्थ हैं
नमन “बोस” को ……

प्रियंका मिश्रा _प्रिया
अलीगढ़

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