कविता · Reading time: 1 minute

नन्हा बचपन

नन्ही सी दुनिया से निकलकर
अपनी बडी सी दुनिया बनाऊंगा,
जो देखे माँ की कोख में
वो ख्वाब बडे यहां सजाऊंगा ।

अंगुली पकडकर सीखा है चलना
अब सफर तय अपने आप करना है,
रहना नही था माँ से दूर एक पल को भी
पर अपने बचपन के लिए ये पाप करना है ।

अब चलना सीख रहा हुँ
गिरकर उठना सीख रहा हुँ,
हर कदम लेता हुँ अपनो का सहारा
अब बिना माँ के चलना सीख रहा हुँ ।

वो माँ को दिन-रात परेशां करना
बाप के गालों पर नाखुनों से निशां करना ,
बचपन में बहुत कुछ कहना था मुझे
बस मुझे आया नही वे जज्बात बयां करना ।

वो दादी की कहानी में परियों की बातें
दादा की गोद में बीती कितनी ही रातें,
कहां याद कर पाता हुँ अब वो सब कुछ
सब धुंधली हो गयी वो प्यारी सी मुलाकातें ।

नन्हें बचपन को जिंदा करने के लिए
यादों की तस्वीर बनाऊंगा ।
नन्ही सी दुनिया से निकलकर
अपनी बडी सी दुनिया बनाऊंगा।।
©नितिन पंडित

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