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नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ

Yatish kumar

Yatish kumar

गज़ल/गीतिका

November 13, 2017

नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ

मेरा देश नहीं मैं बदल रहा हूँ
नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ
मैंने भींच रखे थे मुट्ठी में चाँद सितारे
अब जाके धीरे से मुट्ठी खोल रहा हूँ

सूरज मैं अब तुझको तकने लगा हूँ
मिट्टी की गंध को समझने लगा हूँ
अब चाँदनी से भी उलझने लगा हूँ
रोशनी थोड़ी सही पर चखने लगा हूँ

चिड़ियों को उड़ते निहारने लगा हूँ
पोखर से मिट्टी निकालने लगा हूँ
मैं पेस्ट को दंतमन में बदलने लगा हूँ
योग से अंतर्मन को हरने लगा हूँ

भाई को अब फिर मैं हँसाने लगा हूँ
अम्माँ की गोदी में मैं समाने लगा हूँ
बच्चों को अब और ज़्यादा समझने लगा हूँ
तुम्हें सच,दो सौ फ़ीसदी प्यार करने लगा हूँ

क्याकहूँ ? किरणो से अब मैं छनने लगा हूँ
भीतर से मैं अब यतीश निखरने लगा हूँ
हौले हौले ही सही ,अंदर पिघलने लगा हूँ
हाँ सच में मैं रोज़ थोड़ा बदलने लगा हूँ
कोंपलों की मुलायमियत और फूलों कीसुगन्ध
इन सब से आनंद भाव भरने लगा हूँ
पूरवायी के झोंकों में मैं उड़ने लगा हूँ
मैं ख़ुश्बू को फिर से समझने लगा हूँ

शजर बदलते हैं रंग,सब्ज़ होते हैं नूरानी
ये सारे मंज़र यक़ीन जाने ,अब तकने लगा हूँ
रहमत भी होती है मुझको अता रब
नियामत को तेरी मैं चखने लगा हूँ

डमरू पे शंकर अब थिरकने लगा हूँ
हम्द तेरे दिल से अब पढ़ने लगा हूँ
मौला, तुझसे खुल के बातें करने लगा हूँ
मैं नज़र नहीं अब नज़रिया बदलने लगा हूँ

हम्द= ईश्वर की प्रार्थना
नियामत-ईश्वर प्रदत्त वैभव ,धन
शजर-पेड़
सब्ज़-हरापन हरा भरा

यतीश-११/११/२०१७

Author
Yatish kumar
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