.
Skip to content

नज़र बता रही है इसे उल्फ़त रही है …….

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

December 8, 2016

नज़र बता रही है इसे उल्फ़त रही है
किस तरह मजबूर दिल की हालत रही है

दर्द-ओ-ग़म कहीं सीने में दफ़न करके
खुश- खुश रहने की मेरी आदत रही है

टूटकर बिखर जाता तो फिर ना टूटता
क्यूँ दिल में जुड़ने की ताक़त रही है

हैं आज भी चाँद – तारे आस्माँ पर
दुनियां में तोड़ने की चाहत रही है

तू हासिल नहीं मुझे मगर फिर भी तेरे
आसपास होने से बड़ी राहत रही है

भाग-दौड़ ज़माने की तेज़ धूप में भी
तेरी याद इस दिल में सलामत रही है

कौन झुकता है’सरु’यहाँ किसी सिजदे में
मोहब्बत ही सदियों से इबादत रही है

Author
suresh sangwan
Recommended Posts
इधर फितरत बदलती जा रही है
इधर फितरत बदलती जा रही है उधर उल्फत बिखरती जा रही है इमारत ऊँची ऊँची थाम कर अब कमर धरती की झुकती जा रही है... Read more
बरगला   ये   हवा  रही  है मुझे साथ  अपने  बहा  रही  है मुझे
बरगला ये हवा रही है मुझे साथ अपने बहा रही है मुझे ---------------------------------------------- ग़ज़ल क़ाफ़िया- आ, रदीफ़- रही है मुझे वज़्न-2122 1212 22/112 अरक़ान-फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन... Read more
रात हाथों में मेंहदी लगाती रही
मेरी क़िस्मत मुझे आज़माती रही रंज देती रही दिल दुखाती रही ....... ख़्वाब था जो कि आँखों में ठहरा रहा नींद आती रही नींद जाती... Read more
रौशनी तम निगल रही होगी
रौशनी तम निगल रही होगी रात चुपचाप ढल रही होगी देखकर अपनों के महल ऊँचें मुफलिसी और खल रही होगी हैं नज़र तो झुकी झुकी... Read more