नजर के तीर

नजर के तीर तो चलाये प्यास पर बुझी नहीं
संभल -संभल के वो चली तो जिन्दगी मिली नहीं

जमीं मिली हरेक को यहाँ पे रहने के लिए
बुझा जो दिल उसी में अब चिंगारी लगी नही

चला वो सोच-सोच कर हरेक राह आज तक
मिलें बहुत से गम मगर ये बंदगी रूकी नहीं

गए जो रूठ आज अपनों से रोज यूँ ही अब
घुटी -घुटी सी जिन्दगी मे तिश्नगी नहीं

हँसी खुशी चली गई घड़ी वो अब थमी नहीं जगी नहीं जो प्यास जिन्दगी से मैकशी नहीं

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डॉ मधु त्रिवेदी शान्ति निकेतन कालेज आफ बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर साइंस आगरा प्राचार्या, पोस्ट...
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