नजर कातिल दिखाई दे

जिधर घूमे नज़र तेरी उधर #महफ़िल दिखाई दे।
हुनर पे जाँ लुटी सबकी, नज़र कातिल दिखाई दे।।

हमीं बेचैन हैं बैठे, #तन्हाई क्यूँ चली आई।
हमें तो प्रेम-सागर में, नहीं साहिल दिखाई दे।।

वफ़ा के नाम पर साकी, पिलाते #बेवफ़ाई गम।
सुना, बेखौफ़ बस्ती में, चलन शामिल दिखाई दे।।

नई #आदत यही आई, दफन सब राज सीने कर।
दगा देते उसी को, पाक जिसका दिल दिखाई दे।।

लिखा ये क्या मुकद्दर में, जवाँ होकर #तड़पना जय।
पहर हर रात का दूजा, अगन तिल-तिल दिखाई दे।।

संतोष बरमैया #जय

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 24

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share