कविता · Reading time: 1 minute

नजर आ रहा है

जिधर देखो उधर आज अभिमान ही नजर आ रहा है।
इंसानों के अंदर बैठा हैवान ही नजर आ रहा है।

संवेदनशीलता मरती जा रही है आज के इस दौर में,
इंसानियत का दुश्मन खुद इंसान ही नजर आ रहा है।

देखो स्वार्थ से परिपूर्ण हो गए हैं सारे रिश्ते नाते आज,
अपना होकर भी हर कोई अनजान ही नजर आ रहा है।

पैसे के लेन देन बिना होता नहीं काम सरकारी दफ्तरों में,
कुर्सी पर बैठा हर एक अफसर बेईमान ही नजर आ रहा है।

गरीब को दुत्कार कर अमीरों के तलवे चाटते हैं लोग,
भगवान के जैसा पूजता आज धनवान ही नजर आ रहा है।

सच बोलने, लिखने और कहने की कीमत बहुत भारी है,
सच्चा इंसान सुलक्षणा चंद रोज का मेहमान ही नजर आ रहा है।

डॉ सुलक्षणा अहलावत

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