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नजरें मिलाऊं कि नजरें चुराऊं।

गजल

जहाँ को भुला दूं मैं खुद को भुलाऊँ।
मगर है न मुमकिन तुम्हे भूल जाऊँ।।

सभी जख्म रिसने लगे हैं मेरे अब।
कलेजे को किससे कहां मै सिलाऊं।।

बुरे वक्त में साथ छोड़ा सभी ने।
बचा कौन है अब जिसे आजमाऊँ।।

किसी भी डगर से सनम आ जरा तू।
मैं तेरे लिये चांद तारे बिछाऊँ।।

अगर साथ तेरा मुझे मिल गया तो।
मैं गजलों की महफिल हमेशा सजाऊँ।।

मेरे सामने है सनम आज मेरा।
में नजरें चुराऊँ कि नजरें मिलाऊँ।।

नशा देशभक्ति का मुझ पर चढ़ा है।
तिरंगा उठा हाथ जयहिंद गाऊँ।।

गरीबी ने डेरा मेरे घर है डाला।
तड़पते हैं बच्चे उन्हे क्या खिलाऊँ।।

अगर हमसफर तू मेरा बन गया तो।
जमाने की खुशियाँ तुझी पर लुटाऊँ।।

मिले जन्म जब भी यही आरजू है।
वतन के लिये सर हमेशा कटाऊँ।।

अँधेरा बढे़ गर यहाँ नफरतों का।
मुहब्बत का “दीप”क सदा मैं जलाऊँ।।

प्रदीप कुमार

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pradeep kumar
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पुलिंदा झूठ का केवल नहीं लिखता मैं गजलों में। rnहजारों रंग ख्वाहिश के नहीं भरता... View full profile
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