May 12, 2021 · कविता
Reading time: 1 minute

“नए शोध में”

ये वीरानियां परेशां कर रही हैं,
आंखे खोजती फिर रही जो अब नही है।।

तुम्हे अगर सब आसान लगता हैं,
तो सुनों आवाजों को,जो शमशान से बोल रही है।।

वक्त का ईशारा समझो,गौर करो,
सब बदल गया,प्रकृति संकट में झूल रहीं हैं।।

आदमी से आदमी की लड़ाई कब तक करोगे,
जो अदृश्य है,उसका सामना कैसे करोगे ।।

सदियां गुज़र गईं,आपसी प्रतिशोध में,
संसाधनों को लगाओ नए शोध में।।

1 Like · 4 Comments · 58 Views
Copy link to share
अनिल अहिरवार
23 Posts · 845 Views
Follow 3 Followers
साधारण सी लेखनी हूं, शिक्षा का छोटा सा दीप, जो डटा हुआ है, हवा के... View full profile
You may also like: