गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

धूल ज़हनों पे…

मालो ज़र की तो’ बेशक कमी रह गई
शुक्र है साख अपनी बनी रह गई

क्यों दिलों में बसाकर रखी तल्खियां
अब ज़ुबां पर तिरे चाशनी रह गई

मसअला तो निपट ही चुका है मगर
एक दीवार दिल में खड़ी रह गई

फिर तुम्हारे ही हक में हुआ फैसला
धूल ज़हनों पे अब क्यों जमी रह गई

रह गईं प्यास, अरमां तड़पते रहे
बादलों की ज़मीं से ठनी रह गई

हर खुशी साथ उसके रवाना हुई
सिर्फ आंखों में अब तो नमी रह गई

ख्वाब देखा बिछड़ते हुए एक बार
आंख फिर तो खुली की खुली रह गई

मालो जर के लिए गांव को छोड़कर
लग रहा है कि दुनिया वहीं रह गई

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