धूमिल धरा ,रश्मि हीन दिनकर है ।

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धूमिल धरा ,रश्मि हीन दिनकर है ।
अरुणिमा नही,अरुण की नभ पर है ।

तापित जल,नीर हीन सा जलधर है ।
रीती तटनी ,माँझी नहीं तट पर है ।

व्योम तले दबी अभिलाषाएं ,
आशाओं को डसता विषधर है ।

सीख चला वो अब धीरे धीरे ,
नियति लेती कैसे करवट है ।

रिक्त हुए रिसते रिसते रिश्ते ,
प्यासा सा अब हर पनघट है ।

काल कला की चौखट से ,
“निश्चल” सी आती आहट है ।

…. विवेक दुबे”निश्चल”@…
डायरी 6(32)
Blog post 18/11/18

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