Skip to content

# धूप छांव #

संजय सिंह

संजय सिंह "सलिल"

गज़ल/गीतिका

February 8, 2017

छांव तो है एक छलावा, धूप मन का है भरम l
रात या दिन कर रहे, दोनों के है अपने करम ll

धूप में टपके पसीना, जो कभी तेरे बदन l
छांव तकती राह है, तू चल रहा अपने धरम ll

धूप हो या छांव का पल काम चलना ही तेरा l
जिंदगी के काम आने, में ना हो कोई शरम ll

जो कभी रस्ते सुकोमल, या के कांटों से भरे l
करना पूरा ही सफ़र है, हो नरम या के गरम ll

कुछ भी शाश्वत है नहीं, पल पल बदलता है जहां l
जो अडिग हो फैसला तो, धूप पड़ती है नरम ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

Share this:
Author
संजय सिंह
मैं ,स्थान प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश मे, सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे रचनाएं लिख रहा हूं l सितंबर 2016 से सोशल मीडिया पर हूं I मंच पर काव्य पाठ तथा मंच... Read more

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you