धूप छाँव (डाॅ. विवेक कुमार)

है आज मुझमें सामर्थ्य
खड़ा हूँ पैरों पर अपने
इसलिए तुम
रोज ही आते हो मेरे घर
मेरा हालचाल पूछने।

बाँधते हो तारीफों के पुल
आज बात-बात पर।
किंतु मैं अपने अतीत को
अब तक नहीं भुला पाया हूँ।

गर्दिश के उन दिनों में
तुम दूज के चाँद बन बैठे थे
घर पर रहने के बाद भी
‘नहीं है घर में कहलवा देते थे
कैसे भूलूँ उन क्षणों को मित्र,
जब तुम मुझे देख कर भी
अनदेखा कर देते थे,
यह सोच कर कि,
शायद मैं तुमसे
कुछ माँग ना बैठूँ।

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