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धूप छाँव (डाॅ. विवेक कुमार)

Dr. Vivek Kumar

Dr. Vivek Kumar

कविता

April 24, 2017

है आज मुझमें सामर्थ्य
खड़ा हूँ पैरों पर अपने
इसलिए तुम
रोज ही आते हो मेरे घर
मेरा हालचाल पूछने।

बाँधते हो तारीफों के पुल
आज बात-बात पर।
किंतु मैं अपने अतीत को
अब तक नहीं भुला पाया हूँ।

गर्दिश के उन दिनों में
तुम दूज के चाँद बन बैठे थे
घर पर रहने के बाद भी
‘नहीं है घर में कहलवा देते थे
कैसे भूलूँ उन क्षणों को मित्र,
जब तुम मुझे देख कर भी
अनदेखा कर देते थे,
यह सोच कर कि,
शायद मैं तुमसे
कुछ माँग ना बैठूँ।

Author
Dr. Vivek Kumar
नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका,... Read more
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