वक़्त के आँचल में कही धूप कहीं छाँव है

वक़्त के आँचल में,कहीं धूप कहीं छाँव है
1.मायापति के खेल में,बहती नदी में नाव है,
काँटो से घिरे फूल में,संचरित खुश्बू का भाव है,
मानवीय हथियार से,हदय पे लगे घाव है,
वक़्त के आँचल में,कहीं धूप कहीं छाँव है,
2.आदर्श की लाठी तो, कहीं भेड़िये की चाल है,
बात बोले मीठी तो,बकरा हलाल है,
राह में है मंजिल तो,फ़िसल रहे पाँव है,
वक़्त के आँचल में,कहीं धूप कहीं छाँव है,
3.दूसरों के बातों से, न जीना आधार है,
दरिंदों की हशरते तो,बिखेरना परिवार है,
अपनों के टकराव से तो,दूसरों के दाव है,
वक़्त के आँचल में,कहीं धूप कहीं छाँव है
4.टूट जाए साहस तो,नायक बेकार है,
छोड़ मत आश तू, किससे लाचार है,
मेरे विचार से,संस्कृतियों से गाँव है,
वक़्त के आँचल में,कही धूप कहीं छाँव है,
5.कृशानु में तपकर के,छवि हेम है पाई,
संघर्षों के आत्म कर्म से, मुकुट, ध्वजा लहराई,
कुनबे के इन स्नेह प्यार ने,सींचा मेरा घाव है,
वक़्त के आँचल में,कहीं धूप कहीं छाँव है
राइटर:- इंजी० नवनीत पाण्डेय सेवटा (चंकी)

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