गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

धुन

ज़िन्दगी मे मजबूरियां थी बहुत पर उनसे समझौता न कर सका।
बहुत कुछ चाहत थी फिर भी बहुत कुछ हासिल न कर सका। औरों के गम में तो क्या है खुशियों में भी शामिल ना हो सका। अपने ही ख्यालों में खोए औरों की न सुन सका ।
अपनी राह खुद बनाना चाहता था गैरों के नक़्शेक़दम पर चलना गवारा ना था।
हाथों पर लिखी तक़दीर पर भरोसा न था ।
अपनी तक़दीर खुद लिखना चाहता था ।
फ़ितरत के आगे जज़्बातों के कोई मायने न थे।
अपनी तदब़ीर से अपना मुस्तक़बिल सँवारना चाहता था ।
इसी जुनून में मैं आगे बढ़ता गया मंजिलें आती गई छूटती गई। इस दौर में जाने कितने साथी पीछे छूटते चले गए।
पुराने रिश्ते खत्म होने लगे नए रिश्ते बनने लगे ।
इस सफर की इंतिहा में पाया कि हमसफर तो बहुत थे पर उनमें कोई हमनवा ना था।
शायद मेरा हमनवा जिसकी जुस्त़जू मुझे तब थी , काफी पीछे छूट गया था।
इतनी सब दौलत और शोहरत हासिल करने के बाद भी मेरे हाथ मेरे हमनवा की मोहब्बत के लिए खाली थे।
जिसे मैं अपनी धुन में नज़रअन्दाज़ कर खो चुका था।

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