.
Skip to content

धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है

NIRA Rani

NIRA Rani

कविता

November 7, 2016

न जाने क्यू दिल मे कुछ हलचल हो रही थी
द्वार पे जाकर देखा तो इक पेड़ पे बनी थी

नश्तर लिए हाथो मे पत्ते कतर रहे थे
जी जान से जुटे थे इक पल न ठहर रहे थे

मुंडित किया सिरे से अब ठूंठ सा खड़ा था
पत्ते बिना वो पेड़ अब गिरने को हो चला था

आलय दिया धरा ने
पुष्पित किया पवन ने
बूंदों ने पल्लवित किया था …..
रवि के ताप से जगमग हो चला था …..
पर !!!

मारी कुल्हाड़ी ऐसी बस ढेर हो चला था
टुकड़े किए हजारो ढो के ले चला था

अजब सा मंजर था ये क्या हो रहा था
जीते जी उसने उपकार ही किया था

कुछ नही तो प्राण वायु ही दे रहा था
मर कर भी वो कुछ तो दे रहा है

घर बार को किवाड़ और बिस्तर दे रहा है
फिर भी इसॉ उसके प्राण ले रहा है

अन्जान हो खुद को मलिन कर रहा है
बढ़ते प्रदूषण मे खुद ही सिमट रहा है
स्वयं को प्रक्रति दूर कर रहा है
आपदा को स्वयं ही न्योता दे रहा है
सच….
धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है
धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है

Author
NIRA Rani
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..
Recommended Posts
बहती हवा का प्रश्न
एक ग़ज़ल ******* ★★★ रोशनी आँखों की खुद ही धुंध में खोता चला। आदमी हर आदमी बस धुंध ही बोता चला।। ★★★ बात हर वह... Read more
लो चला मैं... ओमपुरी जी को श्रद्धांजलि
लो चला मैं... तुम सबसे दूर कुछ के लिये बुरा तो कुछ के लिये अच्छा था... लो चला मैं... आंखें नम हो जाये तो खुद... Read more
देखो  न मुझ से रूठ के   दिलबर चला गया --- गज़ल
देखो न मुझ से रूठ के दिलबर चला गया अब लौट कर न आएगा कहकर चला गया कैसे पकड़ सके जिसे रब ने बचा लिया... Read more
देखो  न मुझ से रूठ के   दिलबर चला गया --- गज़ल
देखो न मुझ से रूठ के दिलबर चला गया अब लौट कर न आएगा कहकर चला गया कैसे पकड़ सके जिसे रब ने बचा लिया... Read more